एक बेवा का शिकार-3

(Ek Bewa Ka Shikar-3)

प्रेषक : इमरान ओवैश
भाभी की चुदाई के चार रोज़ बाद एक रात ऐसा मौका भी आया… जब रात के किसी पहर मेरी आँख खुल गई। खुलने का कारण मेरे लंड का खड़ा होना और उसका गीला होना था। मैंने अपनी इंद्रियों को सचेत कर के सोचा तो समझ में आया कि कोई मेरे लंड को अपने गीले-गीले मुँह में लिए लॉलीपॉप की तरह चूसे जा रहा था।
मैंने देखने की कोशिश की पर साये से ज्यादा कुछ न दिखा।

अब ऐसी खुली हरकत तो ज़ाहिर था कि ज़रीना ही कर सकती थी, लेकिन मुझे क्या, ननद न सही भाभी ही सही, एक अदद चूत ही तो चाहिए।
मैंने हाथ बढ़ा कर उसे ऊपर खींच लिया।
और उसे जकड़ कर उसके होंठों का रसपान करने लगा।
वो भी मेरे होंठों और ज़ुबान से खेलने लगी, मैंने दोनों हाथों से उसकी चूचियाँ गूंथनी शुरू की, तो उसकी कराह निकल गई।
“क्या लगा लिया, उस दिन नरम लग रही थी आज तो कुछ सख्त लग रही हैं?”

मैंने उसके कुर्ते को ऊपर करते हुए कहा।
वह कुछ नहीं बोली।
मैंने उसका कुरता उसके सर से ऊपर करके निकाल दिया और उसकी सलवार भी उतार दी। खुद तो वैसे भी चड्डी में ही सोता था। अब दो नंगे बदन की रगड़ा-रगड़ी माहौल में आग भरने लगी।
थोड़ी देर ब्रा के ऊपर से मैं उसके निप्पल कुचलता रहा और वह हौले-हौले सिसकारती रही, फिर उसके स्पंजी वक्षों को ब्रा की कैद से आज़ाद करके दोनों मटर के दानों जैसे निप्पलों को खींचने, चुभलाने लगा।

फिर मेरे हाथों के इशारे पर वो औंधी लेट गई और मैं उसकी पीठ पर लद कर दोनों हाथ आगे ले जाकर उसकी चूचियों को दबाते हुए उसकी गर्दन मोड़ कर उसके होंठों को चूसने लगा। उसने भी एक हाथ से मेरा चेहरा थाम लिया था।
इसके बाद मैं नीचे सरकने लगा।
और बिल्कुल नीचे पहुँच कर उसकी पैंटी को नीचे सरका कर उसके नरम-नरम चूतड़ों को चाटने दबाने लगा और पीछे से ही हाथ डाल कर उसकी गर्म भट्टी की तरह दहकती बुर को छुआ तो जैसे वह सिहर गई।
चिपचिपा पानी भरा हुआ था।

मैं उसी हालत में उसे रखे खुद चित लेट गया और अपना मुँह नीचे से उसकी चूत पर ले आया और ज़ुबान से उसकी कलिकाओं से छेड़छाड़ करने लगा।
वह मचलने लगी…
दोनों हाथों से मैंने उसके डबल-रोटी जैसे चूतड़ थाम रखे थे और जब ऊपरी कलिकाओं को काफी गर्म कर चुका, तो ज़ुबान को नुकीला और कड़ा करके उसके छेद में उतार दिया।
वह ‘सिस्स’ करके रह गई।

मैंने धीरे धीरे उसे जीभ से चोदने लगा और वह हौले-हौले ‘आह-आह’ करती रही। फिर ऐसा वक़्त भी आया जब वह बुरी तरह मचलने लगी और मुझे नीचे से धकेल दिया, पर करवट न बदली और वैसे ही औंधी पड़ी कराहती रही।
मैं सीधा होकर उसकी पीठ पर चढ़ आया और दाहिने घुटने से उसकी जांघ पर दबाव बना कर उसे इतनी दूर ठेल दिया कि नीचे उसकी बुर खुल सके और फिर हाथ से लंड को पकड़ कर उसके छेद पर रखा और अन्दर ठेल दिया।
वह एकदम से अकड़ गई…

पर मैंने उसे निकलने न दिया और उल्टा हाथ उसकी गर्दन के नीचे से निकाल कर उसके चेहरे को अपनी तरफ करके उसके होंठों से अपने होंठ चिपका कर चूसने लगा, तो दूसरे हाथ से उसकी दाहिनी चूची को भी ज़ोर-ज़ोर से भंभोड़ने लगा।
लंड जब उसके पानी से भीग गया तो बाहर निकाल कर वापस पूरा अन्दर ठेल दिया और उसके नरम गद्देदार चूतड़ों का आनंद लेते हुए उसी अवस्था में धक्के लगाने लगा।

वह पहले ही चरम पर पहुँच चुकी थी, इसलिए कुछ ही धक्कों में उसकी चूत बहने लगी और मेरे लंड को नहला गई। मैं भी रुका नहीं बल्कि उसी हालत में धक्कों की स्पीड बढ़ाता चला गया और आखरी धक्के इतनी ज़ोर-ज़ोर से लगाए कि बेड बुरी तरह हिल कर रह गया। ऐसा हो ही नहीं सकता कि नीचे उसके यूँ हिलने की आवाज़ें न गई हों।

फिर मैं उसकी चूत में ही झड़ गया और उसके चूतड़ों पर अपना पेट कस के सारा माल अन्दर ही निकाल दिया।
आधी रात के वक़्त की यह चुदाई मुझे इतना थका गई कि मेरे होश ही न बजा रहे और पता भी न चला कि मैं कब नींद के आगोश में जा समाया।
सुबह जब आँख खुली तो तबियत में भारीपन था और मन ही नहीं हो रहा था कि काम पर जाऊँ। जैसे-तैसे उठा तो ग्यारह बज चुके थे। बिस्तर झाड़ा तो एक बाली मिली, शायद कल रात की धींगा-मुश्ती में रह गई थी।

उसे लिए नीचे पहुँचा तो सन्नाटा छाया हुआ था और ज़रीना अकेली रसोई में थी। मैं उसके पास पहुँचा तो मुझे देखने लगी।
“बाली रह गई थी रात में !” मैंने उसे बाली थमाते हुए कहा।
उसने हैरानी से मुझे देखा और फिर बाली देखने लगी।
“कहाँ रह गई थी?”
“रात में जब तुम ऊपर थी।” मैंने आहिस्ता से कहा कि कहीं निदा न सुन ले।
“ओह ! यह मेरी नहीं, निदा की है और मैं रात में ऊपर नहीं गई।”

मैं अवाक सा उसे देखता रहा और फिर हैरानी से निदा के कमरे की तरफ देखा।
“वह घर नहीं है, बच्चों को लेकर अपनी फूफी के यहाँ गई है ! तो कल रात वह चुदी है तुमसे।”
“कमाल है, जब मैंने उसे समझ कर चोदा तो तुम निकली और जब तुम्हें समझ कर चोदा तो वो निकली। तुम्हें पता है कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ।”
“हाँ, पता है… मेरे लिए।”
“क्या?” मैंने हैरान हो कर उसे देखा।

“हाँ… तुम्हारे भाई साहब आज तक मेरी प्यास नहीं बुझा पाये, बच्चे तो जैसे-तैसे करके हो ही जाते हैं, लेकिन औरत को संतुष्ट कर पाना हर किसी के बस का नहीं होता। कभी गलत संगत में अपनी खराबी कर ली थी।
शादी के बाद से ही यह हाल है कि एक तो ठीक से खड़ा नहीं होता, ऐसा लगता है कि घुसाने के टाइम मुड़-तुड़ कर बाहर ही रह जाएगा, अपनी सील तोड़ने के लिए मुझे खुद बैंगन इस्तेमाल करना पड़ा था और अपनी बुर को इतना ढीला करना पड़ा था कि असलम साहब अपने उस ‘लुंज-पुंज’ से उसे चोद पाएँ लेकिन धीरे-धीरे जब उम्र चढ़नी शुरू हुई तो दूसरी दिक्कत आ गई कि खड़ा हुआ नहीं कि झड़े नहीं। मुद्दतें हो जाती हैं मुझे अपनी प्यास बुझाए और इसी की वजह से मेरे मिजाज़ में भी चिड़चिड़ापन आ गया है।

अब मेरी बर्दाश्त से बाहर हो चला था, कहाँ तक मैं घर की इज्जत और उनकी मान-मर्यादा का ख्याल रखती। मैं अब बाग़ी होने लगी थी, तभी उन्होंने यह रास्ता निकाला कि कम से कम घर की बात घर में ही रहे।”
“पर उन्होंने तो कहा था के मुझे उनकी बेवा बहन के लिए यहाँ रुकना है कि कहीं वो बहक कर खुद का कोई अहित न कर ले।”
“हाँ, उनका मर्दाना आत्म-सम्मान.., मर्द जो ठहरे, अपनी हार सीधे-सीधे कैसे स्वीकार कर लेते और बहरहाल बात तो निदा की भी थी, आखिर जायदाद किसे प्यारी नहीं होती, किसी और से सैट हो कर चली गई, तो सब गया हाथ से और यहीं चुदती रहेगी, तो बाहर किसी को देखेगी भी नहीं।”
“उसे पता है कि मैं तुम्हारे लिए लाया गया हूँ?”

“नहीं, पर मैं बता दूँगी कि उसके भाई ने हम दोनों के ही लिए एक मर्द का इंतज़ाम किया है और अब तो वो तुमसे चुद भी चुकी है, तो उसे भला क्या इंकार होगा।”
“पर मुझे झूठ बोल कर यूँ उल्लू बनाना पसंद नहीं आया और इस बात का बदला तो मैं असलम भाई से लेकर ही रहूँगा।”
“कैसे?”
“तुम अब उन्हें फोन लगाओगी और बताओगी के मुझे सब पता चल चुका है और अब मैं तुम्हें अभी ही चोदने जा रहा हूँ और तुम अपनी चुदाई की दास्तान उन्हें फोन पर सुनाओगी और वो फोन नहीं काटेंगे… फोन काटा तो मैं बाहर सब को सच बता कर यहाँ से चला जाऊँगा।”
वह हँसी.. उसके चेहरे पर चमक आ गई।

हाँलाकि मेरी तबियत बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन फिर भी मैं उसे गुसलखाने में पकड़ लाया। फोन उसके हाथ में ही था। उसने नम्बर मिलाया और असलम भाई को बताने लगी। उधर से कोई आवाज़ न आई और मैंने शावर चला दिया, हम दोनों के कपड़े भीग गए।
फोन उसने पानी से दूर ही रखा था, वो फोन पर वो सब बोलती रही जो मैं करता रहा।
मैंने उसके कपड़े उतार दिए और अपने भी…

फिर कम स्पीड में शावर चला कर बहते पानी में उसके भरे-भरे गुब्बारे दबाने, चूसने लगा। उसकी पीठ पर ज़ुबान फिराई और हाथ आगे किए, उसके पेट को सहलाता रहा।
वह फोन पर बताती तो रही, पर जिस क्षण उसे तेज़ आनन्द की लहर कचोटती, उसका स्वर लहरा जाता या चुप हो जाती।
नीचे होते उसके चूतड़ों को चाटने लगा और दोनों मोटी फाँकों को अलग कर के उसकी गांड के छेद में उंगली कर दी। वो सिसक उठी और मैं उसकी टांगों को थोड़ा फैला कर आगे से उसकी पानी से भीगी बुर में मुँह डाल कर उसे मुँह से चोदने लगा और हाथ की उंगली से उसकी गुदा के छेद को। उसके लिए फोन सम्भाल कर बात करते रहना मुश्किल हो गया और आवाज़ लहराने लगी।

जब वह इतनी गर्म हो गई कि उसके लिए बात करना मुमकिन न रह गया तो मैंने अपना मुँह और ऊँगली हटा ली और खुद खड़ा हो गया और उसे नीचे झुका लिया। उसने मेरा इशारा समझने में देर नहीं की। फोन पर बताया कि क्या करने जा रही थी और मेरे लंड को मुँह में ले कर चूसने लगी।
फोन पर उसकी ‘गूं.. गूं.. और चप.. चप..’ असलम भाई को सुनाई दे रही होगी।
जब लंड काफी टाइट हो गया तो मैंने उसे हटा दिया और कमोड पकड़ कर झुका दिया, एक पाँव नीचे फर्श के टाइल पर तो दूसरा कमोड की सीट पर और मैंने पीछे से उसके चूत में अपना लंड सरका दिया। अब वो कुछ और बोलने के काबिल तो नहीं थी बस फोन मुँह के पास रखे ‘आह-आह… ओह’ करती रही और मैं उसके चूतड़ों को पकड़े धक्के पर धक्के लगाता रहा।

इस चुदाई में मैंने कोई और आसन नहीं अख्तियार किया, बस पैर की पोजीशन ही बदलवाई और इसी तरह लगातार धक्के लगाता रहा।
धीरे धीरे मैं चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया और साथ ही वो भी और जिस घड़ी एक तेज़ कराह के साथ हम दोनों झड़े, फोन उसके हाथ से छूट गया और फर्श पर बिखर गया।

मैंने अपने अंतिम पड़ाव पर उसके चूतड़ों में अपनी उँगलियाँ धंसा कर उसे अपने लंड पर ऐसे भींचा था, जैसे उसे खुद में ही समा लेना चाहता हूँ…
उसने भी फोन छोड़ कर कमोड की सीट को दोनों मुट्ठियों में जकड़ लिया और इस तरह हमारी चुदाई संपन्न हुई।
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