दिल्ली की दीपिका-3

(Dilli Ki Dipika-3)

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मेरी हालत खराब हो रही थी, पर ला


ज के कारण अब भी होंठ से यह निकल नहीं रहा था कि ‘अभि, बहुत हो गई नौटंकी, चल निकाल अपना लौड़ा और घुसेड़ दे मेरी चूत में !’

मैं चुप थी क्योंकि वह बढ़ तो उसी ओर रहा था। कंधे से अब उसके होंठ पीठ पर वहाँ पहुँचे, जहाँ ब्रा का हुक था। यहाँ चूमने के बाद यह पीठ पर ही और नीचे तक पहुंचा। मैं महसूस कर रही थी कि अब उसके होंठो का साथ देने जीभ भी आ गई हैं, और यह जीभ को मेरे बदन पर जिस तरीके से हिला रहा था उससे मुझे गुदगुदी सी लगने लगी। तब इसके होंठ और जीभ मेरी कमर तक आ गए। यह पैन्टी के ऊपर चाटने लगा।

तभी मैंने चिंहुक कर अपनी पीठ को ऊपर तान ली। मेरे ऐसा करते ही अभि कमर के पास से अपना मुँह घुमाकर सामने ले आया और मेरे पेट पर जीभ चलाने लगा। उसका मुँह मेरी नाभि पर टिका। यहाँ जीभ चलाने के बाद वह अपनी जीभ को रगड़कर ऊपर की ओर बढ़ा। ब्रा के एकदम नीचे जीभ को घुमाने के बाद वह मेरे दोनों बूब्स के नीचे आया। अब उत्तेजना में मेरी गर्दन पीछे हो गई और चेहरा छत की ओर था। उसके होंठ मेरे हाथ के नीचे से होते हुए गर्दन पर पहुँचे और यहाँ से फिर मेरे वक्ष के ऊपर आ गए। अब वह ब्रा में ऊपर से ही मेरे स्तनों पर जीभ घुमा रहा था।

उत्तेजना से मेरी हालत भी खराब हो रही थी। वह मेरे कप में जीभ घुमाने के बाद अब ब्रा का कप उंगली से हटाकर निप्पल तक अपनी जीभ पहुंचाने का प्रयास कर रहा था। मैं अब दोनों हाथ टेककर पीछे हो गई। इससे उसका हौसला बढ़ा और ब्रा को पूरा सरकाकर निप्पल बाहर निकाल लिया। अभि मेरे ने निप्पल को मुँह में लिया और अपनी जीभ से उसे सहलाने लगा। स्तन के दूसरे हिस्से को अपने हाथों से दबाने लगा। इससे मुझे अद्भुत आनन्द मिल रहा था।

इसके बाद उसने अपना मुँह हटाया और हाथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया। ब्रा खुली, अवि ने इसे उतार कर एक तरफ़ रख दिया। मैं पलंग के किनारे ही बैठी थी। यह नीचे उतरा मुझे खड़ा करके अपनी बाहों में ले लिया। मैं भी उससे चिपक गई। उसने अब मेरे होंठो को अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। हमारे चुम्बन का यह दौर लंबा चला। तब तक उसके हाथ मेरे नंगे शरीर पर घूमते रहे।

सच बताऊँ तो इस समय मेरे पूरे बदन के रोएँ खड़े हो गए थे। उस समय मेरी हालत ऐसी गजब की थी कि आज भी उस पल को याद करके मेरी फ़ुद्दी से पानी रिसना शुरु हो जाता हैं। वह वाकया याद आते ही मुझे किसी अज्ञात विद्वान की कही यह बात याद आ रही हैं कि ‘यंग जनरेशन में लड़के लड़कियों की हालत करीब-करीब एक सी ही होती हैं। रात को जब नींद नहीं आती हैं तब लड़कों के हाथ में लूल्ली व लड़कियों के हाथ में मूली होती हैं।’

सही में मैंने ना जाने कितनी मूलियाँ ऐसे ही खराब कर चुकी हूँ और अब तो काम निकालने के लिए मोमबत्ती भी लाकर रखी हुई हैं। तो अब वापस कहानी पर आती हूँ। चुम्बन करते हुए ही अभि मुझे फिर से पलंग पर बिठाया व अब मेरे निप्पल तक आया।

मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, मैं पलंग पर ही लेट गई। इसने अपने चूमने चाटने का सिलसिला जारी रखा। साथ ही इसका हाथ अब मेरी योनि के आसपास सहलाने लगा। मेरा बदन अब कांपने लगा। बाद में मुझे पता चला कि यह कंपकंपी ठण्ड की नहीं, उत्तेजना की थी।अभि प्यार करते हुए नीचे की ओर बढ़ा और पैन्टी के ऊपर से ही मेरी चूत पर जीभ मारने लगा। मैंने अपने दोनों हाथों से उसके सिर के बाल पकड़ लिए थे। वह पैन्टी के ऊपर से अपनी जीभ हटाकर चूत के करीब ही जांघ पर ले आया और उसे चाटने लगा। ऐसा करते हुए ही उसने मेरे घुटनों तक का पूरा शरीर चाटा।

अब वह सीधा हुआ, अपने होंठों को मेरे होंठों पर टिकाया और हाथ बढ़ाकर मेरी पैन्टी उतारने लगा। फिर उसने मुझे छोड़ा व मेरी पैन्टी को खींचकर नीचे सरका दिया। मैंने भी अपने पंजों में फंसी पैन्टी को निकालकर पैर से ही निकाल कर सरका दिया। अब मैं पूर्णत: नंगी थी। अभि अब मेरे पास ही बैठकर यूं ही देखने लगा।

अब जब सब आपको बता रही हूँ तो यह भी रहस्य भी खोल देती हूँ कि मेरी चूत पूरी गीली हो गई थी, मानो इसमें पानी डाला गया हो। अभि मुझे यूं ही देखे जा रहा था और मेरी बेताबी चरम पर थी, मैंने उससे कहा- क्या मुझे नंगी देखता ही रहेगा या कुछ करेगा भी?

वह बोला- इस सुंदर शरीर को पहले जी भर कर देख तो लेने दो, फिर जो कहोगी वो करूँगा।

मैं बोली- ला दिखा तो तेरे पास क्या है?

वह बोला- क्या दिखाऊँ?

मुझे गुस्सा आया बोली- अरे लौड़ा है या नहीं?

वह बोला- हैं जान, पर अब मेरा लौड़ा देखकर क्या करोगी? उसे तो अपनी इस प्यारी प्यारी चूत में लेना, तब आपके मन को ठीक लगेगा।यह बोलकर वह मेरी चूत पर झुका और उसे चाटने लगा। मुझे यह थोड़ा अजीब लगा कि वह मेरी चूत से निकलने वाले पानी को भी चाट रहा था। पर इससे मेरी बेचैनी इतनी ज्यादा बढ़ी कि मैं उसके बालों को पकड़कर अपनी ओर खींचा। परिणाम यह हुआ कि अभि मेरे ऊपर आया, मेरे होंठों पर अपने होंठ रखकर चूमना शुरू कर दिया।

मैं अपने हाथ बढ़ाकर उसके लौड़े पर ले गई। अभि अब तक कपड़े पहने हुआ था। मेरा हाथ उसके पैंन्ट में चेन के पास पहुँचा तो एहसास हुआ कि यह जगह बहुत उठी हुई है। मैं उसकी चेन तक अपना हाथ बढ़ाने के लिए उससे छूटी। अब तक अभि को भी भीतर रखा अपना लंड़ बर्दाश्त नहीं हुआ और वह मुझसे हटकर अपने कपड़े उतारने लगा। शर्ट, बनियान, पैन्ट के बाद उसने अपनी अंडरवियर भी उतारकर फेंक दी।

मैंने उसका मस्त तना हुआ लण्ड पहली बार देखा, यह अच्छा लंबा व मोटा था। उसके गुलाबी सुपारे को देखकर मैंने सोचा कि इसे प्यार कर दूं ताकि यह मेरी चूत में अच्छे से जाकर मुझे चुदने का मजा दे दे पर मुझे अपनी चूत की आग ने ऐसा परेशान किया कि मैं इस लंड को पकड़कर अपनी जांघों के पास ही ले आई।

अभि खुद भी इसे मेरी चूत में घुसाने को बहुत उतावला था, वह मुझे ठीक से लिटाकर मेरे ऊपर आया व अपने लौड़े को मेरी चूत में लगाकर रगड़ने लगा। अब मेरे बदन में मानो किसी ने बिजली की तार छुआ दी हो, मैं तड़प कर अभि से बोली- जल्दी कर ना प्लीज। अभि ने अपने लौड़े को चूत के ऊपर रखकर अपनी कमर को झटका दिया, मुझे चूत में बहुत जोर का दर्द हुआ, चीखकर उसे बोली- बाहर निकाल, लगता है मेरी चूत फट गई है।

थोड़ी देर पहले ही उसे लिंग डालने के लिए कहने वाली मैं अब जब वह लण्ड अंदर घुसा रहा है, तब मैं उसे इसे ऐसा न करने के लिए कह रही थी। चूत में बहुत जोरों से दर्द हो रहा था, लिहाजा मैं उसे ऐसा ना करने को बोल रही थी, पर वह नहीं माना, लण्ड बाहर करने के बदले और एक झटका मारकर इसे और भीतर कर दिया।

मेरी तो मानो जान ही निकल गई, अपने हाथों से उसे धक्का देने के अलावा मैं अपने पैर भी सीधा करने का प्रयास करने लगी, पर अभि मुझे चोदने से बिल्कुल परहेज नहीं कर रहा था।इस तरह की कशमकश के बाद उसका लौड़ा मेरी चूत में पूरा घुस गया, उसने शाट लगाने शुरू कर दिए। मैं उसे रोकने का प्रयास करती रही, पर उसने अपनी धक्कमपेल जारी रखी। मुझे महसूस हो रहा था कि मेरी चूत फट गई है, और उससे खून भी आ रहा है। ऊपर से यह कमीना मुझे चोदे ही जा रहा है।

अब मैं सोचने लगी कि आगे से इस चुदाई से बिल्कुल दूर रहूँगी, इस हरामखोर से अब बात भी नहीं करूँगी।

यह सब मेरे मन में चल रहा था, तभी मुझे लगा कि अब जब इसने लण्ड भीतर घुसा ही दिया है तो क्यूँ न अभी चुदाई का ही मजा लेने की कोशिश की जाए।

मैंने महसूस की कि अब मेरा दर्द बिल्कुल काफ़ी कम हो गया है और चूत में अब बहुत मीठा अहसास होने लगा है। यूँ लगने लगा कि अब यह लण्ड और भी भीतर घुसे, और अब यह कभी बाहर ही ना निकले, इसे और अंदर करने मैं भी नीचे से उछलने लगी।

मैंने नीचे से अपने चूतड़ उछालने की स्पीड और बढ़ा दी। कुछ देर ऐसा ही चला फिर मुझे लगा कि भीतर किसी ने मानो आग में पानी डाल दिया हो।

मैंने अभि की ओर देखा तब पता चला कि उसका काम हो गया है, यानि उसका झड़ गया है जिससे वह निढाल हो मुझ पर लेट गया। मैं डर गई कि यह साला अपना काम निकालकर सो ना जाए। इसलिए नीचे से अपनी स्पीड बढ़ाकर मैं उसके लंड को और जगाने का प्रयास करने लगी।

पर आह्ह ह्ह ! मुझे लगा मानो मेरे अंदर का कोई दबा हुआ लावा बड़े विस्फोट के साथ बाहर आया है।

जी हाँ, मेरा रज भी एक फव्वारे के साथ छूट पड़ा। इससे मैंने अभि को अपने से भींच लिया।

तो दोस्तो, यह हुई मेरे चूत की महीन झिल्ली यानि मेरी सील के टूटने की बात।

इस दिन अभि ने तुरंत बाद फिर चुदाई की और फारिग होकर जाते-जाते एक बार मुझे फिर चोदा यानि पहले ही दिन मेरी चुदाई 3 बार हुई।

जब इसका लौड़ा पहली बार मेरे भीतर घुसा था, तब कहां मैं इसे गाली देते हुए सोच रही थी कि अब इससे कभी नहीं मिलूंगी और उससे जमकर चुदने के बाद अब मैं सोच रही थी कि यह मुझसे दूर ही ना हो, ताकि हमें चुदाई का और मौका मिल सके।

दोस्तो, इस कहानी में कुछ भी बनावटी नहीं हैं। जो हुआ, जैसा हुआ मैंने अपने एक बहुत अच्छे मित्र जवाहर जैन के कहने पर आप लोगो के लिए लिख दिया है। अब आप लोग बताइए कि मेरी यह कहानी आपको कैसी लगी।

हाँ अभि मुझसे दूर ना हो, इस लालच में मैंने उसे दूसरे ही दिन अपना जन्मदिन होने की बात कहते हुए निमन्त्रित किया, यह भी बोली- मम्मी पापा तो हैं नहीं, इसलिए किसी को भी बुला नहीं रही हूँ, सिर्फ़ मैं और तुम ही रहेंगे।

तो मेरे इस निमंत्रण को स्वीकार कर क्या अभि मेरे घर आएगा? और क्या मैं फिर उसके साथ अपनी चुदाई का यह खेल और खेल पाऊँगी? यह बात मैं बहुत जल्द ही कहानी के दूसरे भाग में लिखकर आप तक पहुँचा रही हूँ।

कहानी पर अपनी राय मुझे मेरे मेल आईडी पर दें।



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